संपादकीय | जंतर-मंतर पर छात्रों की आवाज आखिर सरकार तक समय रहते क्यों नहीं पहुंची? शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से देश जवाब चाहता है
Sachin Tyagi, Editor, News Highway news portal.
लेखक: सचिन त्यागी
संपादक, News Highway
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों छात्रों का जुटना केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस पीड़ा, निराशा और असंतोष का प्रतीक था जो लंबे समय से प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं के मन में पल रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि जंतर-मंतर पर क्या हुआ। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों?
जब छात्र लगातार अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे थे, सोशल मीडिया पर अभियान चला रहे थे, ज्ञापन दे रहे थे और आंदोलन की चेतावनी दे रहे थे, तब शिक्षा मंत्रालय ने समय रहते पहल क्यों नहीं की? क्या छात्रों के प्रतिनिधियों को बुलाकर बातचीत नहीं की जा सकती थी? क्या संवाद के जरिए इस टकराव को टाला नहीं जा सकता था?
इन सवालों का जवाब देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से अपेक्षित है।
लोकतंत्र में किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत संवाद होती है, जबकि सबसे बड़ी कमजोरी संवाद का अभाव। यदि छात्रों की समस्याओं को पहले ही गंभीरता से सुना जाता और उनके साथ सार्थक बातचीत होती, तो शायद जंतर-मंतर तक आंदोलन पहुंचने की नौबत ही नहीं आती।
देश का युवा आज केवल डिग्री नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष और पारदर्शी व्यवस्था चाहता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, समय पर भर्ती, परिणामों में स्पष्टता और भविष्य को लेकर भरोसा—यही उसकी प्रमुख अपेक्षाएं हैं। जब इन मुद्दों पर लगातार सवाल उठते हैं और समाधान नहीं मिलता, तो असंतोष का स्वर आंदोलन में बदल जाता है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी विरोध प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनी रहे। प्रशासन का दायित्व है कि शांति बनाए रखे और प्रदर्शनकारियों का दायित्व है कि वे संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखें। लेकिन इन दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सरकार की होती है, जो संवाद का रास्ता खोल सकती है।
सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का भी है। क्या मंत्रालय के पास ऐसी व्यवस्था है, जहां देशभर के छात्रों की शिकायतें समय पर सुनी जाएं? क्या ऐसी कोई नियमित संवाद प्रक्रिया है, जिससे युवाओं का भरोसा मजबूत हो? यदि नहीं, तो इसकी शुरुआत अब होनी चाहिए।
भारत दुनिया का सबसे युवा देश बनने की ओर अग्रसर है। ऐसे में युवाओं की ऊर्जा को संघर्ष की ओर नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा में लगाना सरकार, समाज और संस्थाओं—सभी की साझा जिम्मेदारी है।
News Highway का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र में संवाद, पारदर्शिता और संवेदनशीलता ही सबसे बड़ा समाधान है। छात्रों की आवाज को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से नहीं, बल्कि देश के भविष्य की आवाज मानकर सुना जाना चाहिए। सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है, और जवाब देना लोकतांत्रिक जवाबदेही का।
आज भी देर नहीं हुई है। यदि सरकार छात्रों के प्रतिनिधियों से खुले मन से बातचीत करे, उनकी मांगों पर समयबद्ध निर्णय ले और पारदर्शी रोडमैप सार्वजनिक करे, तो विश्वास दोबारा स्थापित किया जा सकता है।
देश का युवा टकराव नहीं चाहता। वह अवसर चाहता है। वह आश्वासन नहीं, समाधान चाहता है।
✍️ सचिन त्यागी
संपादक – News Highway
संपादकीय नोट: यह लेख एक संपादकीय (Opinion) है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं और इन्हें तथ्यात्मक समाचार रिपोर्ट के रूप में नहीं, बल्कि विश्लेषण एवं टिप्पणी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
