क्या शिक्षा मंत्रालय की कमान अब जयंत चौधरी को मिलनी चाहिए? डिग्री भी है, विजन भी… अब फैसला बीजेपी का

जयंत चौधरी
✍️ लेखक: सचिन त्यागी
संस्थापक एवं संपादक, News Highway
देश में शिक्षा मंत्री बदल गया, लेकिन शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े सवाल वहीं के वहीं हैं।
धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल खत्म हुआ। उनके समर्थक उपलब्धियां गिनाएंगे, विरोधी नाकामियां। लेकिन एक बात पर शायद ही कोई बहस हो कि पिछले कुछ सालों में शिक्षा मंत्रालय सबसे ज्यादा विवादों में रहा। कभी पेपर लीक, कभी भर्ती परीक्षाओं पर सवाल, कभी छात्रों का सड़क पर उतरना, कभी विश्वविद्यालयों में तनाव। हालात ऐसे बने कि छात्रों के आंदोलन ने सरकार की भी बेचैनी बढ़ा दी।
अब फिलहाल मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रह्लाद पटेल के पास है। यह स्थायी व्यवस्था नहीं मानी जा रही। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मंत्रिमंडल विस्तार होगा और शिक्षा मंत्रालय को नया मुखिया मिलेगा।
यहीं से एक नाम दिमाग में आता है… जयंत चौधरी।
क्यों?
क्योंकि राजनीति में सिर्फ चेहरा नहीं, बैकग्राउंड भी मायने रखता है।
जयंत चौधरी उस परिवार से आते हैं, जिसकी पहचान सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि किसानों और शिक्षा के सवालों से भी रही है। दादा चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री रहे। पिता चौधरी अजीत सिंह कई बार केंद्र सरकार में मंत्री रहे। लेकिन विरासत से ज्यादा अहम सवाल यह है कि खुद जयंत क्या लेकर आते हैं?
अगर उनकी पढ़ाई पर नजर डालिए तो तस्वीर अलग दिखती है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री वेंकटेश्वर कॉलेज से बीकॉम (ऑनर्स)। उसके बाद दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में गिने जाने वाले लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस (LSE) से अकाउंटिंग और फाइनेंस में पोस्ट ग्रेजुएशन। राजनीति में आने से पहले कॉरपोरेट सेक्टर और फाइनेंस की दुनिया का अनुभव भी लिया।
यानी किताब भी देखी है, कारोबार भी देखा है और राजनीति भी।
आज जब भारत नई शिक्षा नीति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्किल डेवलपमेंट और ग्लोबल कॉम्पिटिशन की बात कर रहा है, तब क्या शिक्षा मंत्रालय में ऐसे व्यक्ति की जरूरत नहीं, जो इन विषयों को सिर्फ भाषण में नहीं, पढ़ाई और अनुभव से भी समझता हो?
जयंत चौधरी की राजनीति भी पुराने ढर्रे वाली नहीं दिखती। वह अक्सर युवाओं, स्टार्टअप, स्किल डेवलपमेंट, खेल और रोजगार की बात करते हैं। सोशल मीडिया पर भी उनकी भाषा अपेक्षाकृत संयमित रहती है। वह उन नेताओं में नहीं गिने जाते जो हर मुद्दे पर सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी करते हों।
एक और दिलचस्प बात है।
2024 से वह केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्रालय के राज्य मंत्री भी हैं। साथ ही कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। यानी मंत्रालय का कामकाज उनके लिए बिल्कुल नया नहीं होगा। अगर कभी उन्हें पूरी जिम्मेदारी मिलती है तो उन्हें फाइलें समझने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
लेकिन राजनीति में योग्यता ही सब कुछ नहीं होती।
बीजेपी के सामने गठबंधन की राजनीति भी है और संगठन का गणित भी। राष्ट्रीय लोकदल भले ही सीटों के लिहाज से बहुत बड़ी पार्टी न हो, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसका असर किसी से छिपा नहीं है। किसान आंदोलन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों में आरएलडी एनडीए के लिए अहम सहयोगी बनकर उभरी है।
ऐसे में अगर बीजेपी शिक्षा मंत्रालय जैसी बड़ी जिम्मेदारी जयंत चौधरी को देती है तो यह सिर्फ एक मंत्री बदलने का फैसला नहीं होगा। यह गठबंधन को मजबूत करने और युवाओं को एक अलग संदेश देने की कोशिश भी मानी जाएगी।
लेकिन सवाल यही है—क्या बीजेपी ऐसा जोखिम उठाएगी?
इतना महत्वपूर्ण मंत्रालय किसी सहयोगी दल को देना आसान फैसला नहीं होता। सत्ता में हर मंत्रालय सिर्फ प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत भी होता है। बीजेपी अब तक बड़े मंत्रालय अपने पास रखने की रणनीति अपनाती रही है। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय छोड़ना उसके लिए आसान नहीं होगा।
फिर भी, अगर सरकार वास्तव में यह संदेश देना चाहती है कि शिक्षा उसके लिए प्राथमिकता है, तो उसे मंत्रालय में ऐसा चेहरा बैठाना होगा जिसकी पहचान सिर्फ राजनीतिक न होकर बौद्धिक भी हो।
देश के करोड़ों छात्र इस बात से शायद ही मतलब रखते हों कि मंत्री किस पार्टी का है। उन्हें इससे मतलब है कि पेपर लीक बंद हों, भर्ती समय पर हो, विश्वविद्यालय बेहतर बनें, रिसर्च को बढ़ावा मिले, डिग्री के साथ रोजगार भी मिले और शिक्षा व्यवस्था भरोसेमंद बने।
शिक्षा मंत्रालय को अब भाषण नहीं, दिशा चाहिए।
क्या वह दिशा जयंत चौधरी दे सकते हैं?
इसका जवाब भविष्य देगा। लेकिन इतना जरूर है कि उपलब्ध योग्यता, शिक्षा, अनुभव और मौजूदा जिम्मेदारियों को देखें तो उनका नाम उन नेताओं में जरूर शामिल होता है जिन पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।
अब गेंद बीजेपी के पाले में है।
— सचिन त्यागी
संस्थापक एवं संपादक, News Highway
अस्वीकरण: यह एक संपादकीय लेख है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के विश्लेषण और मत हैं। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में प्रचार करना नहीं है।
