डी मोनफोर अकादमी में ‘प्राचीन भारत और जैव प्रौद्योगिकी’ विषय पर विशेष व्याख्यान, विद्यार्थियों ने जाना भारतीय ज्ञान-परंपरा का वैज्ञानिक पक्ष
बहसूमा (मेरठ)। डी मोनफोर अकादमी, बहसूमा में कक्षा 11वीं एवं 12वीं के विद्यार्थियों के लिए “प्राचीन भारत और जैव प्रौद्योगिकी” विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारत की समृद्ध ज्ञान-परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और आधुनिक विज्ञान के बीच गहरे संबंध से परिचित कराना था। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए विषय से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कीं और विशेषज्ञों से अपने प्रश्न भी पूछे।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित शिक्षाविद् डॉ. प्रियांक भारती ने ‘प्राचीन ज्ञान’ विषय पर व्याख्यान देते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के जीवन दर्शन, नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिक सोच पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन, नेतृत्व क्षमता और सकारात्मक सोच का अमूल्य मार्गदर्शक है, जो आज के युवाओं के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।
वहीं डॉ. रूपेश कुमार ने ‘प्राचीन भारत और जैव प्रौद्योगिकी’ विषय पर अपने व्याख्यान में बताया कि आधुनिक विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी की अनेक अवधारणाओं की प्रेरणा भारतीय ज्ञान-परंपरा में निहित है। उन्होंने विद्यार्थियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने और अनुसंधान के क्षेत्र में नवाचार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. समीर वर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि भारत का इतिहास वैज्ञानिक चेतना, अनुसंधान और ज्ञान की समृद्ध परंपरा से परिपूर्ण रहा है। विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते हुए आधुनिक विज्ञान के साथ उसका समन्वय स्थापित करना चाहिए, ताकि वे भविष्य की चुनौतियों का आत्मविश्वास के साथ सामना कर सकें।
विद्यालय की निर्देशिका डॉ. गरिमा वर्मा ने कहा कि प्राचीन भारतीय संस्कृति और आधुनिक तकनीक का संतुलित समन्वय ही विद्यार्थियों के समग्र विकास और सशक्त राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है। उन्होंने विद्यार्थियों से शिक्षा को केवल परीक्षा तक सीमित न रखकर उसे जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।
विद्यालय के निदेशक डॉ. के.के. शर्मा ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है। गीता का जीवन दर्शन और जैव प्रौद्योगिकी की वैज्ञानिक सोच विद्यार्थियों को मानसिक, नैतिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध बनाती है।
उपप्रधानाचार्या श्रीमती ऋतु चिकारा ने विद्यार्थियों की जिज्ञासा, सक्रिय सहभागिता और अनुशासन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे शैक्षिक कार्यक्रम विद्यार्थियों में नई सोच, अनुसंधान की भावना और ज्ञान के प्रति रुचि विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने विशेषज्ञों के साथ संवाद कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। विद्यालय प्रबंधन ने भविष्य में भी ऐसे ज्ञानवर्धक व्याख्यान आयोजित करने का संकल्प व्यक्त किया।
