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हस्तिनापुर के शिक्षाविद् सुनील पोसवाल की काव्य रचना ‘भगवा का प्रवाह’ राष्ट्र निर्माण और सनातन संस्कृति का संदेश

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हस्तिनापुर। मेरठ।
विचार, संकल्प, सेवा और समर्पण से ही राष्ट्र का निर्माण संभव है—इसी भाव को केंद्र में रखकर हस्तिनापुर के शिक्षाविद् सुनील पोसवाल ने अपनी चतुर्थ काव्य रचना ‘भगवा का प्रवाह’ प्रस्तुत की है। यह काव्य रचना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी को समर्पित है, जिन्होंने व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र सेवा का संकल्प देश को दिया।

कवि सुनील पोसवाल ने अपनी रचना के माध्यम से भारतीय संस्कृति, भगवा ध्वज के महत्व और सनातन मूल्यों को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि यह काव्य रचना युवा पीढ़ी को सनातन संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और सेवा भाव के प्रति जागरूक करने का कार्य करेगी। भारत भूमि को धन्य बताते हुए उन्होंने संतों, मुनियों, ऋषियों और वीरों के त्याग, बलिदान और शौर्य को राष्ट्र की आत्मा बताया।

🪔 काव्य रचना: “यह भगवा का प्रवाह”

यह भगवा का प्रवाह है कभी रुकने नहीं पाएगा।
2047 तक भारत को विकसित बनवाएगा।।

संतों, मुनियों, ऋषियों की सेवा, संकल्प और समर्पण का प्रवाह है,
संस्कार और संस्कृति के पथ पर यह देश हमेशा आगे बढ़ता जाएगा।।

राष्ट्र की सेवा में जिन्होंने प्राण हँसते-हँसते न्योछावर कर दिए,
यह देश उन वीरों की शहादत के गीत हमेशा गाएगा।।

जीवन जो अपना भारत भूमि के लिए अमर कर गए,
यह देश उन वीरों की शौर्य गाथा को कभी भूल नहीं पाएगा।।

यह भगवा का प्रवाह है कभी रुकने नहीं पाएगा।
भारत को विकास और प्रगति के पथ पर बढ़ाएगा।।

यह व्यक्ति निर्माण का प्रवाह है कभी रुकने नहीं पाएगा,
यह संघ के 100 वर्षों की राष्ट्र सेवा का प्रवाह है जो निरंतर आगे बढ़ता जाएगा।।

यह केशव जी के संकल्प और गुरुजी की सेवा का मां भारती के चरणों में अर्पण है,
जो भारत को सशक्त, समृद्ध और समर्थ बनाएगा।।

यह भारत माता के सम्मान का प्रवाह है जो निरंतर आगे बढ़ता जाएगा,
यह मां भारती की गूंज को विश्व पटल तक पहुंचाएगा।।

मां भारती के शीश को गर्व से विश्व में ऊंचा उठाएगा,
यह वैदिक संस्कृति का गुणगान पूरे विश्व में कराएगा।।

यह भगवा का प्रवाह है कभी रुकने नहीं पाएगा।।

काव्य रचना के अंत में कवि ने “जय हिंद, जय भारत, वंदे मातरम्” के उद्घोष के साथ राष्ट्रभक्ति की भावना को और सशक्त किया है। यह रचना न केवल साहित्यिक दृष्टि से प्रभावशाली है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को भी मजबूती प्रदान करती है।