मवाना खुर्द।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरवशाली 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में मवाना खुर्द स्थित रुद्रा कॉलेज प्रांगण में एक भव्य एवं विचारोत्तेजक हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन न केवल संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रनिष्ठा के भाव को पुनः जागृत करने वाला सिद्ध हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों द्वारा भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं पुष्पार्चन के साथ किया गया। वातावरण “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के उद्घोष से राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग उठा। हिंदू सम्मेलन आयोजन समिति द्वारा सभी अतिथियों को शॉल एवं भगवान श्रीराम का चित्र भेंट कर सम्मानित किया गया, जो भारतीय परंपरा और अतिथि-सत्कार की जीवंत मिसाल रहा।
सम्मेलन के मुख्य वक्ता हिंदू जागरण मंच के संगठन मंत्री गोपाल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ ने अपने सौ वर्षों के इतिहास में राष्ट्रनिर्माण, समाजसेवा, आपदा प्रबंधन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया है। उन्होंने संघ को एक विचारधारा नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का जीवंत संस्कार बताया।
इसके उपरांत शाश्वत आनंद सरस्वती ने हिंदुत्व विषय पर अत्यंत प्रभावशाली वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्यों और सनातन परंपराओं की वैज्ञानिक एवं दार्शनिक व्याख्या करते हुए उपस्थित जनसमूह को जाति-पात, ऊँच-नीच और भेदभाव से ऊपर उठकर स्वयं को पहले हिंदू मानने की शपथ दिलाई। दोनों हाथ उठाकर ली गई यह शपथ सामाजिक एकता का सशक्त प्रतीक बनी।
कार्यक्रम में उपस्थित पूज्य श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर सरितानंद गिरी ने अपने ओजस्वी उद्बोधन की शुरुआत भारत माता के जयकारों के साथ की। उन्होंने कहा कि आज का समय आत्ममंथन का है—यह सोचने का कि हम अपने राष्ट्र और समाज के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से मातृशक्ति से आह्वान किया कि वे अपनी संतानों को सनातन संस्कारों से जोड़ें, उन्हें अपनी संस्कृति का गर्व सिखाएँ और राष्ट्रसेवा के मार्ग पर अग्रसर करें।

सम्मेलन की विशिष्ट अतिथि डॉ. दिशा दिनेश, सदस्य—ललित कला बोर्ड अकादमी, संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश ने संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत प्रस्तावित पाँच परिवर्तन विषय पर सारगर्भित वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, नागरिक कर्तव्य और स्वदेशी चेतना—ये पाँच परिवर्तन भारत को आत्मनिर्भर और सशक्त राष्ट्र बनाने की आधारशिला हैं।
कार्यक्रम के दौरान देश और प्रदेश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को मंच से सम्मानित किया गया, जिससे युवाओं में राष्ट्रगौरव और प्रेरणा का भाव और अधिक प्रबल हुआ।
यह हिंदू सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि संस्कृति, चेतना और चरित्र निर्माण का संगम सिद्ध हुआ। सम्मेलन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि जब समाज जाति और भेदभाव से ऊपर उठकर एकजुट होता है, तब राष्ट्र की नींव और अधिक मजबूत होती है।

