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आओ चले हस्तिनापुर की ओर: जहां प्रकृति, संस्कृति और परमात्मा का अद्भुत संगम दिखता है

हस्तिनापुर केवल एक ऐतिहासिक नगर नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म और भारतीय संस्कृति का जीवंत संगम है। गंगा की अविरल धारा, घने वन क्षेत्र और शांत वातावरण मानो हर किसी को अपनी ओर बुलाते हैं। यहां पहुंचते ही मन स्वतः ही निर्मल हो जाता है और व्यक्ति आध्यात्मिक अनुभूति से भर उठता है।

बृजघाट से लेकर बैराज तक फैला हस्तिनापुर वन सेंचुरी क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य का अनमोल उदाहरण है। यहां नित्य नए दृश्य देखने को मिलते हैं। कहीं पक्षियों का कलरव सुनाई देता है तो कहीं वन्य पशु निर्भय होकर विचरण करते नजर आते हैं। यह क्षेत्र वेटलैंड से भी जुड़ा है, जो प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करता है।

हैदरपुर और भिकुंड की वेटलैंड में देश-विदेश से आने वाले प्रवासी पक्षी अपनी रंग-बिरंगी छटा बिखेरते हैं। उनकी मधुर आवाज़ और समूह में उड़ान मन को मोह लेती है और देखने वाला भाव-विभोर हो जाता है। प्रकृति के ये दृश्य अनजाने में ही मन पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं।

हस्तिनापुर एक संरक्षित वन्य क्षेत्र है, जहां जीव-जंतुओं को संरक्षण मिलता है। यहां स्थित वन्य जीव रेस्क्यू सेंटर में घायल और संकटग्रस्त पशुओं की देखभाल की जाती है। वानिकी प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षु प्रशिक्षण लेकर जल, जंगल और जीव संरक्षण की सेवा में जुटते हैं।

गंग नहर की पटरी से होकर वन सेंचुरी की सैर करना अपने आप में एक अलग अनुभव है। हरियाली, शांति और प्राकृतिक दृश्य व्यक्ति को सांसारिक शोर-शराबे से दूर ले जाते हैं। गंगा की पवित्र धारा के दर्शन से मन को अद्भुत शांति प्राप्त होती है और हस्तिनापुर को स्वर्ग समान कहा जाना सार्थक प्रतीत होता है।

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इतिहास की दृष्टि से भी हस्तिनापुर अत्यंत पावन नगरी रही है। यह कौरव-पांडवों की राजधानी रही, जिसका उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। जैन, सिख और सनातन परंपरा से इसका गहरा संबंध रहा है। अखंड भारत की प्राचीन राजधानी के रूप में भी हस्तिनापुर का वर्णन मिलता है।

आज भी यहां भारतीय संस्कृति का जीवंत दर्शन होता है। शुद्ध देसी भोजन, लोक परंपराएं और आध्यात्मिक वातावरण हर आगंतुक को अपनी जड़ों से जोड़ देता है। संस्कृति, प्रकृति और परमात्मा का त्रिवेणी संगम हस्तिनापुर को एक विशिष्ट पहचान देता है।

हस्तिनापुर के यही नजारे हर बार यही कहते प्रतीत होते हैं—आओ चले हस्तिनापुर की ओर, जहां इतिहास बोलता है, प्रकृति मुस्कुराती है और आत्मा को शांति मिलती है।

आओ चले हस्तिनापुर की ओर

आओ चले हस्तिनापुर की ओर
हस्तिनापुर के नजारे हमें बुलाते है ।।

प्रकृति और परमात्मा के अद्भुत नजारे
हमे दिख जाते है ।।

हस्तिनापुर की वन सेंचुरी में
नित्य नए नजारे मिल जाते हैं।।

कहीं पर पक्षी
कहीं पर पशु
विचरण करते दिख जाते हैं।।

बृजघाट से बैराज तक
हस्तिनापुर वन सेंचुरी क्षेत्र कहलाता है।।

वेटलैंड से भी है इसका नाता
जो प्रवासी पक्षियों को लुभाता है ।।

हैदरपुर और भिकुंड की वेटलैंड में
प्रवासी पक्षी हमको मिल जाते हैं ।।

जाने और अनजाने में ही सही
वह हम सब के मन को मोह जाते हैं।।

देख के रंग-बिरंगे नजारे उनके
और सुनकर उनकी करतल धवनी
हम भाव विभोर हो जाते हैं ।।

आओ चले हस्तिनापुर की ओर
हस्तिनापुर के नजारे हमें बुलाते हैं ।।

वन्य रक्षित क्षेत्र है हस्तिनापुर
यहां जीव जंतु हमें मिल जाते हैं ।।

वन्य जीव रेस्क्यू केंद्र में
जीव जंतु संरक्षण पाते हैं ।।

वानिकी प्रशिक्षण केंद्र हस्तिनापुर मे
प्रशिक्षु प्रशिक्षण करने आते हैं ।।

जल ,जीव और जंगल की
फिर सेवा करने जाते हैं ।।

गंग नहर की पटरी से
हम वन्य जीव सेंचुरी की सैर कर जाते है।।

देखकर इनके नजारो को
हम आध्यात्मिक व प्राकृतिक दृश्यो में
खो जाते हैं।।

गंगा की अविरल धारा से
मन निर्मल हो जाता है ।।

देख के हस्तिनापुर के अद्भुत नजारे
स्वर्ग इसे कहा जाता है ।।

कौरव पांडव की है यह पावन नगरी।।

जैन, सिख से भी इसका नाता है।।

सनातन संस्कृति का केंद्र रहा हस्तिनापुर
शास्त्रों में भी वर्णन आता है।।

अखंड भारत की राजधानी रहा हस्तिनापुर
वर्णन यह मिल जाता है।।

आओ चले हस्तिनापुर की ओर
हस्तिनापुर के नजारे हमें बुलाते हैं।।

ग्रीनलैंड की देख के रचना
मन मेरा गदगद हो जाता है।।

भारतीय संस्कृति का होता दर्शन यहां
शुद्ध देसी भोजन भी मिल जाता है।।

संस्कृति, प्रकृति, परमात्मा का है
त्रिवेणी संगम
हर नजारा हमें यहां मिल जाता है।।

आओ चले हस्तिनापुर की ओर
हस्तिनापुर के नजारे हमें बुलाते हैं ।।

यह रचना हस्तिनापुर के इतिहास और प्रकृति पर आधारित द्वितीय काव्य-रचना है, जिसके रचयिता शिक्षाविद् सुनील पोसवाल, जिला मंत्री भाजपा मेरठ एवं जिला प्रभारी ‘मन की बात’ मेरठ हैं।

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